HEALTH TIPS: फल खाने हों , तो सबसे सस्ते ठेले पर जाइए।

- May 27, 2019
आज जो बाज़ार में सबसे सस्ता बिक रहा है , वही सबसे स्वास्थ्यपरक है। आपके लिए भी , पृथ्वी के लिए भी। जो सस्ता है , वह मौसमी फल है और बहुत सम्भव है , स्थानीय भी हो।

क्या ज़रूरत कि आप ढाई सौ रूपये के किसी विदेशी फल के प्रति लालायित हों ? दूर देश से ला कर बेचा जा रहा फल केवल फल नहीं है , वह ट्रांसपोर्ट का भाड़ा और पैकेजिंग का सामान भी बन चुका है। यक़ीनन महँगा बिकेगा , निश्चित ही व्यापारी एग्ज़ॉटिक के नाम पर उसकी मुँहमाँगी क़ीमत वसूलेंगे।

स्थानीयता और ऋतु-अनुकूलन भोजन में जितना रख सकें , रखिए। चिन्तन से बौद्धिक बनिए। जागरूकता से भी। फ़्रांसीसी क्रान्ति को समझना एक बात है , फ़्रांस का मेकअप रोज़ लगाकर पर्यावरण को हानि पहुँचाना दूसरी। अमेरिका से लेने को जो कुछ है , उसे विचारात्मक रखिए। भोगात्मक चीज़ें यथासम्भव देशी ही स्वास्थ्यसम्मत हैं। हम तुमसे आइंस्टाइन ले लेंगे , तुम्हारा मैकडॉनल्ड तुम्हें मुबारक़ !

पूरी पृथ्वी की जलवायु क्या एक है ? पूरी पृथ्वी के जीवजन्तु क्या एक-से हैं ? तो पूरी पृथ्वी पर पैदा होने वाली सामग्रियाँ हर जगह क्यों बेची और खायी जाएँ ? क्यों न यथासम्भव अपने यहाँ अपने अनुसार भोजन-तन्त्र विकसित किया जाए ?

मुक्त बाज़ार के नाम पर जब मैं-आप लखनऊ में खड़े होकर नारियल-पानी पीते हैं , तो पृथ्वी के बुरे दिन क्यों न आएँगे ! अगर नारियल की उपलब्धि लखनऊ में होनी होती , तो वह यहाँ उग सकता। लेकिन वह यहाँ डीज़ल फूँक कर लाया जाता है , बढे दाम पर बेचा जाता है , हम-आप उसे स्ट्रॉ लगाकर पीते हैं।

हम नारियल पीकर आगे बढ़ जाएँगे , पर डीज़ल और स्ट्रॉ अपना काम करेंगे। डीज़ल से पृथ्वी गर्म होगी , स्ट्रॉ तो एक हज़ार साल बाद भी किसी भोजन में हमारा-आपका ही कोई बच्चा खाएगा और नुकसान झेलेगा।

अब कुछ लोग कहेंगे तो डीज़ल से तो कारें भी चल रही हैं। प्लास्टिक का ढेरों सामान हर व्यक्ति इस्तेमाल कर रहा है। सच बात है। लेकिन डीज़ल और प्लास्टिक ज़रूरत में ख़र्च किये जा रहे हैं या अय्याशी में --- यह सोचना महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

आज हम दुनिया की सबसे बड़ी भीड़ों से एक हैं। भीड़ को झूठी इज़्ज़त दी जाती है , तो उसे बाज़ार कहा जाता है। आदमी ग्राहक का ओहदा ओढ़कर स्वयं को महान् समझने लगता है। उपभोक्ता होने की कोई महत्ता नहीं है। सामान ख़रीद सकना कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है कि जो कुछ खरीदा जा रहा है , उसे आप-हम पहले से कितना जानते हैं।

बाज़ार जानता है कि भोग का प्रतिरोध तब होगा , जब अय्याशी केवल कुछ को मिल सकेगी। इसलिए वह हम-सभी को अय्याशी में पार्टिसिपेट करने को कहता है। अब चूँकि संसाधन सीमित हैं , तो सबको अच्छा गुणवत्तापरक भोग तो मिलने से रहा। उद्योगति का बच्चा बेहतर खिलौने से खेलेगा , जबकि कामवाली बिरमा के बच्चे के खिलौने में घटिया क्वॉलिटी के रसायन होंगे। बड़े व्यापारी-महिला-उद्योगपति की लिप्स्टिक में हानिकारक रसायनों की मात्रा ग़रीब रेशमा की लिप्स्टिक से कहीं कम हो , यह बहुत सम्भव है।

भेड़चाल से बचिए। जानकर खरीदेंगे, कम खरीदेंगे। दीपिका-आलिया-अमिताभ के कहे पर खरीदेंगे , तो ठगे जाएँगे। पढ़िए , जागरूक बनिए , अपनी सच्ची आवश्यकताओं के बारे में सोचिए और तब पैसे निकालिए।

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