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बलिदान दिवस - बिरसा मुंडा

बलिदान दिवस - बिरसा मुंडा

बिरसा ने किसानों का शोषण करने वाले जमींदारों के विरुद्ध भी संघर्ष प्रारम्भ किया, जिससे लोग उनसे जुड़ने लगे। इस पर पुलिस ने उनको गिरफ्तार कर दो वर्ष के लिए हजारीबाग जेल में डाल दिया।

वहां से छूटने के बाद बिरसा ने अपने अनुयायियों के दो दल बनाए, एक दल धर्म का प्रचार करने लगा तो दूसरे को जमींदारों के शोषण के खिलाफ लगा कर अपना अभियान शुरु किया।
1897 से 1900 के बीच बिरसा के साथी और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे। उन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर-कमान से लैस होकर खूँटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेना से हुई, जिसमें अंग्रेजी सेना हार गई। इसके बाद कई जनजाति नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन बिरसा हाथ नहीं आए।
बिरसा मुंडा और अंग्रेजों के बीच अंतिम व निर्णायक लड़ाई 1900 में रांची के पास डोम्बारी पहाड़ी पर हुई। हजारों की संख्या में पराक्रमी मुंडा, बिरसा के नेतृत्व में लड़े, पर तीर-कमान व भाले कब तक बंदूकों-तोपों का सामना करते? लोग बेरहमी से मार दिए गए, अंग्रेज जीत गए। पर, बिरसा वहां से बच निकलने में सफल रहे।
बिरसा को पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने पांच सौ रुपये का इनाम रखा था, इसके परिणामस्वरूप बिरसा 03 मार्च, 1900 को जम्कोपाई जंगल के चक्रधरपुर से पकड़े गए। बिरसा ने अपनी अंतिम सांस रहस्यमय ढंग से 09 जून 1900 को जेल में ली। कहा जाता है कि बिरसा को अंग्रेजों ने विष देकर मार दिया था। अंग्रेजों के खिलाफ बिरसा का संघर्ष 6 वर्षों से अधिक चला।
बिरसा को उनके दर्शन के लिए ‘धरती के आबा’ भी कहा जाता है, ‘आबा’ का अर्थ भगवान होता है।