खोखला हिन्दी विरोध, दबाव में नुकसान ज्यादा

- June 08, 2019

खोखला हिन्दी विरोध, दबाव में नुकसान ज्यादा


देश में नई सरकार बन गई, सरकार के आते ही के. कस्तूरीरंगन समिति ने नई शिक्षा नीति का मसौदा सरकार को सौंपा था, इसके तहत नई शिक्षा नीति में तीन भाषा प्रणाली को लागू किया जाना प्रस्तावित हुआ, इसी को लेकर केंद्र के प्रस्ताव पर हंगामा मचना शुरू हो गया है। इसे लेकर तमिलनाडु से विरोध की आवाज उठ रही है।

आखिर दक्षिण में विरोध किस बात का है? क्या अंतराष्ट्रीय लोकभाषा सर्वेक्षण विभाग की रपट से दक्षिण अनभिज्ञ है जो रपट यह कहती है कि 'जो बच्चें एक से अधिक भाषा में दक्ष या कहें प्रवीण होते है वो अन्य बच्चों की तुलना में 67% अधिक बुद्धिमान होते है'
या फिर इस बात से अनभिज्ञ है कि सम्पूर्ण राष्ट्र की 42% जनता हिंदी को अपनी प्रथम भाषा मानती है, और यदि दक्षिण भारतीयों को व्यापार-विनिमय आदि दक्षिण राज्य के अतिरिक्त किसी अन्य राज्य से करना है तो वहाँ के लोगों की भाषा हिंदी का समझना अनिवार्य है, क्योंकि अंग्रेजी जानने-समझने वाले महज 7 प्रतिशत लोग ही है हिंदुस्तान में। या फिर दक्षिण इस बात से अनभिज्ञ है कि उनके राज्य में आने वाले पर्यटकों में 70 फीसद हिन्दीभाषी पर्यटक है, यदि दक्षिण में हिंदी नहीं समझेंगे लोग तो पर्यटकों से कैसे व्यवहार बनाएंगी और हर व्यक्ति स्थानीय गाइड का खर्च उठाने में सक्षम नहीं होता, इसलिए दक्षिण के पर्यटन उद्योग प्रभावित होगा।
अथवा दक्षिण इस बात से भी मुँह मोड़ रहा है कि बिन हिंदी के ज्ञान के दक्षिण के लोगों को हिंदुस्तान के अन्यक्षेत्रों में रोजगार व नौकरी के अवसर मिलना कम हो जाते है।
आखिर दक्षिण चाहता क्या है? महज राजनीति की कुत्सित चाल के आगे सर झुकाने की प्रवृति के चलते नुकसान तो दक्षिण में रहने वाले लोगों का होना तय है।
क्योंकि राजनैतिक लोग तो भाषा के विरोध में अपनी राजनीतिक रोटी सेंक रहें है, जबकि वे भी इस बात को स्वीकारते है कि हिंदी पट्टी के साथ सामंजस्य से ही दक्षिण की सफलता निहित है।
क्योंकि लगभग 50 करोड़ से अधिक भारतीयों की भाषा हिंदी है और बिन हिन्दी ज्ञान के प्रगति के मार्ग बाधित है।

वैज्ञानिकता और समन्वय का गुण है हिन्दी में

सभी भारतीय भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो सभी भाषाओं के मूल में संस्कृत, प्राकृत और पाली निहित है। और हिंदी वर्तमान में जनभाषा के रूप में स्थापित भाषा है, जिसे आधा हिंदुस्तान बोलता-लिखता है। इसी के आधार पर भारतीय राज्यों में समन्वय स्थापित करने, विचार विनिमय करने, अखंडता स्थापित करने, व्यवहारिक आदान-प्रदान की नीति स्थापित करने, पर्यटन आदि उद्योगों को बढ़ावा देने, व्यवसाय को समूचे देश में फ़ैलाने, नौकरी-रोजगार प्राप्त करने जैसे तमाम लक्ष्यों की पूर्ति के लिए हिंदी का जानना-समझना उतना आवश्यक है जितना शरीर में कार्बनडाई आक्साइड और ऑक्सीजन का होना है।
क्योंकि केवल क्षेत्रीय भाषाओं की प्रवीणता से समूचे देश में व्यक्ति का स्थापित हो जाना संभव नहीं है, उसके पीछे कारण यह भी है कि क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों का दायरा सीमित है।
इन्हें बोलने-सुनने और समझने वाले लोगों की संख्या सीमित है।
अब पूरे देश से संबंध बनाने की स्थिति में कोई तो एक भाषा हो जो यह गुण रखती हो, अंग्रेजी अभी भी हिंदुस्तान के 47% गांवों में नहीं पहुँची है, इसलिए अंग्रेजी के समर्थन की तो बात ही सिरे से खारिज हो जाती है।
तमिल, तेलगु, कन्नड़, मलयाली, आसामी, मराठी, गुजराती, पंजाबी, कश्मीरी आदि भारतीय भाषाओं का सीमित दायरा उन्हें जनभाषा का दर्जा नहीं दे सकता, ऐसे में हिंदी के सिवा कौन खेवन हार है भारत की तरक्की का।
      दक्षिण और महाराष्ट्र के कुछ नेताओं की विवशता है उनकी राजनैतिक दुकान, इसके चलते वो विरोध तो जताएंगे, पर क्या जनता भी अनपढ़ है जो ये समझ नहीं पा रही है कि किस भाषा को महज अपना लेने मात्र से प्रगति का एक द्वार और खुल रहा है जो अब तक केवल इसलिए बंद था, क्योंकि राजनीति की कुत्सित दृष्टि उस पर है।

पर्यटन कभी उद्योग नहीं बन पाएगा

सच तो यह है कि अहिन्दीभाषी प्रदेशों में जो पर्यटन उद्योग थोड़ा बहुत भी अभी चल रहा है उसका कारण है हिंदी पट्टी के पर्यटक। मान लिया जाए कि दक्षिण आदि राज्यों में हिंदी कोई जानने-समझने वाला शेष नहीं रहा, और हिंदी जानने वालों को मारने-पीटने लगे तो क्या हिंदी पट्टी के पर्यटक उस राज्य में कभी आने की सोचेंगे भी? इससे नुकसान किसका है, आम जनता का या राजनैतिक लोगों का।

अंग्रेजी से लाभ क्या

जब देश में राजभाषा अधिनियम बन रहा था तब भी एक जनभाषा जिसे बोलने-समझने वालों की संख्या 50 प्रतिशत थी, उसे भी अपना मान एक ऐसी भाषा के साथ साझा करना पड़ा जो अभी भी इकाई में ही सिमटी हुई है।
देश में सक्रिय हिंदी विरोधी ताकतों ने अंग्रेजी को बढ़ावा देने की हिमाकत क्यों की, इसके पीछे विदेशी ताकतों द्वारा हिंदुस्तान को बतौर बाजार इस्तेमाल करना निहित है।
चूँकि भारत विश्व का दूसरा बड़ा बाजार है, और इस पर कब्जा करना अंग्रेजियत की आरंभिक भावना है, इसी के चलते वो देशविरोधी ताकतें इन लोगों को मदद करती आ रही है और हमारे देश का एक  इतिहास ये भी रहा है कि जयचंद और कासिम जैसे गद्दार हर युग में भारत में मौजूद रहें है।
आखिर वर्तमान सरकार को ये भी सोचना चाहिए कि जब शिक्षा नीति में सबकी मातृभाषा, स्थानीय भाषा, भारतीय भाषाओं को सम्मान दिया जा रहा है तो फिर क्यों ये विरोध हिंदी का हो रहा है?
इस हिन्दी विरोध के बहाने हमला देश की आंतरिक अखंडता का है। जो ताकतें मुद्दों की राजनीति नहीं कर सकती, वे भाषा, समाज, संस्कृति, धर्म और जातिगत आधार पर ही देश व सरकार का ध्यान भटका सकती है।
विरोध करने वालों में कौन शामिल है, इनका इतिहास क्या है इस बात की भी विवेचना की जानी चाहिए।
वर्ना दबाव तो हिंदी पट्टी भी बना सकती है ,परंतु हिंदी पट्टी में गुंडा तत्व न होना उसके सहिष्णु और संस्कारित होने का सूचक है।
🖊 डॉ अर्पण जैन 'अविचल'
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