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5 Jun :- विश्व पर्यावरण दिवस (WORLD ENVIRONMENT DAY) POST-2

हर साल 5 जून को विश्वपर्यावरणदिवस  मनाया जाता है। इस बार विश्व पर्यावरण दिवस की थीम वायु प्रदूषण है। वैसे भी भारत वायु प्रदूषण के मामले में अव्वल है। पिछली बार विश्व पर्यावरण दिवस का मेजबान देश भारत था और इस बार चीन को यह सम्मान मिला है। आइए विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर पर्यावरण को बचाने के लिए कुछ जरूर कदम उठाते हैं और इन बातों का संकल्प लेते हैं ताकि हम और हमारी पीढ़ियां इस धरती पर शुद्ध हवा में सांस ले सकें।

स्वच्छता बढ़ायें

कचरा चाहे, डीजल में हो अथवा हमारे दिमाग में; ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ाने में उसकी भूमिका सर्वविदित है, किंतु स्वच्छता का मतलब, शौचालय नहीं होता। शौचालय यानी शौच का घर यानी शौच को एक जगह एक जगह जमा करते जाना। गंदगी को जमा करने से कहीं स्वच्छता आती है ?

दरअसल, स्वच्छता का मतलब होता है कचरे / कबाड़ का उसके स्त्रोत से न्यूनतम दूरी पर न्यूनतम समय में सर्वश्रेष्ठ निष्पादन करना; कचरे / कबाङ का अधिकतम संभव पुर्नोपयोग करना तथा ऐसी आदत बनाना, ताकि कचरा/कबाङ उत्पन्न होने की मात्रा शून्य पर आकर टिक जाये। अतः गंदगी न फैलायें; गंदगी को ढोकर न ले जायें। वह जहां है, उसे वहीं निपटायें। पुनचक्रित कर पुर्नोपयोग में लायें।

कचरे को उसके स्त्रोत पर निपटायें

हवा के कारोबारी, एक ओर कार्बन क्रेडिट की बात कर रहे हैं और दूसरी ओर कनाडा में हवा अब बोतलों में बंद करके बेची-खरीदी जा रही है। कुदरत ने हमें जो कुछ मुफ्त में दिया है, आगे चलकर वह सभी कुछ बाजार में बेचा-खरीदा जायेगा; हमारे प्राण भी। क्या हम यह होने दें ? सोचें कि क्या समाधान है ?

दुनिया के देशों में कार्बन की सामाजिक कीमत, 43 डाॅलर प्रति टन का अनुमान लगाया जाता है। मुनाफा कमाने वाले औद्योगिक और वाणिज्यिक उपक्रमों से कार्बन टैक्स के रूप में इसकी वसूली की बात कही जाती है। पर्यावरण कर के रूप में भारत में भी इसकी वसूली शुरु हो चली है। यह 'प्रदूषण करो, जुर्माना भरो' के सिद्धांत पर आधारित विचार है। क्या यह समाधान है ? क्या इस समाधान के कारण लोग टैक्स भरकर, कचरा फैलाने केे लिए स्वतंत्र नहीं हो जाते ?

अभी भारत, कचरे को उसके स्त्रोत से दूर ले जाकर निष्पादित करने वाली प्रणालियों को बढ़ावा देने में लगा है। लोग भी सीवेज पाइपों ही विकास मान रहे हैं। इस सोच कोे बदलकर, आइये हम स्त्रोत पर निष्पादन क्षमता का विकास करे।
#संयंत्रों से जो कार्बन डाई ऑक्साइड  निकले, वे उसे वापस धरती की भूगर्भीय परतों में  दबायें
कोयले से बिजली बनाने वाले संयंत्र, कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन बङे दोषियों में से एक हैं। उनके लिए यह नुस्खा, कारगर हो सकता है। ऐसी तकनीक से बिजली उत्पादन की लागत तो बढ़ जायेगी, किंतु कार्बन उत्सर्जन में जो कमी आयेगी, वह लागत की भरपाई से कम नहीं होगी। यह नुस्खा अपनाने से ताप विद्युत परियोजनाओं की जान बच जायेगी; वरना् उनकी विदाई की मांग पर ध्यान देने के दिन आ गये हैं।

ऐसी व्यवस्था बनायें, जो कंपनियों की ऊर्जा बचत हेतु सक्षम बनाये 

न्यूनतम बिजली खपत वाले उपकरणों के प्रति जानकारी, सुलभता, उपयोग की अनिवार्यता तथा तद्नुसार बिजली दरों में विविधता सुनिश्चित कर यह किया जा सकता है। हां, याद रखें कि कम्पयुटर को हाइबरनेट या स्क्रीनसेवर मोड में रखने से ऊर्जा की बचत नहीं होती, बल्कि कार्बन उत्सर्जन और बढ़ जाता है। अगर अगले कुछ घंटे काम न करना हो, तो कम्पयुटर बंद रखें। आखिरकार, इससे सभी का फायदा है; कम्पयुटर का भी।

कम खपत वाले बल्बों से रोशनी बढ़ायें; ग्रीन लेबल उपकरण ही अपनायें; बिजली खपत घटायें 

कम खपत वाले बल्बों का चलन भारत में शुरु हो गया है। इनकी कीमतों को कुछ और घटाने तथा अपनाने को प्रेरित करने की जरूरत है। हर कनेक्शन पर मीटर की अनिवार्यता इसमे मददगार होगी। दूसरी ओर ऊर्जा क्षमता ब्यूरो की पहल पर  अब बिजली की अधिक खपत वाले रेफ्रिजरेटर, ए सी, हीटर, कूलर, इस्त्री, ओवन जैसे कई उपकरणों पर ग्रीन लेबल दिखाई देने लगा है। यह लेबल, यह बताता है है कि उपकरण कितनी कम या ज्यादा बिजली खायेगा। खरीदारी करें, तो पहले ग्रीन लेबल देखें।

जितनी बिजली / ईंधन खायें, उतना काम भी करके दिखायें 

लगभग खटारा हो गये स्कूटर, कार, जीप, पंखे अथवा पुरानी हो गई डीजल मोटर क्यों रखें, यदि वह सामान्य से बहुत अधिक बिजली/ईंधन खाती है ? इस प्रकार वे कार्बन उत्सर्जन बढ़ाने में अपना योग ही बढ़ाते हैं। सरकारी रोक हो या न हो, स्वयं पहल कर उन्हे बेचें, बिजली / ईधन व अपना पैसा दोनो बचायें। अच्छा हो कि हाथ से चलने वाले उपकरण ले आयें।

सूर्य, पवन और और पशुधन को नमस्कार करें; सौर, पवन और बायोगैस ऊर्जा का आशीष घर ले आयें 

सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और गोबर से घर-घर संभव बायोगैस व बिजली बेहतर विकल्प हैं। यह लकङी-उपले वाले चूल्हे से भी निजात देंगे और कोयले से भी। ताप विद्युत से सचमुच निजात पानी है, तो आइये, इन्हे सस्ता, सुलभ और सरल बनाने के काम मे लगें।

कभी भूगर्भीय ऊर्जा और हाइड्रोजन ईंधन के बारे में भी विश्लेषण करें  

वैज्ञानिक कहते हैं कि ज्वालामुखियों में बिजली उत्पादन की अकूत संभावना छिपी है। जापान में यह संभावना, हकीकत में बदलने लगी है। अंडमान-निकोबार जैसे भारतीय द्वीप समूहों  में अनेक ज्वालामुखी भूमि के गर्भ में सोये बैठे हैं। क्या हम उन्हे जगाकर, पुचकार कर बिजली बनायेंगेे ?

हाइड्रोजन का उत्पादन व संग्रहण एक समस्या जरूर है, किंतु क्या हाइड्रोजन चालित दुपहिया/तिपहिया, बेहतर विकल्प हो सकते हैं ? यह विचारणीय विषय है। दुनिया ने ऐसे वाहन बना लिए है। क्या भारत उनका उपयोग करें ?

कम ईंधन खपत और धुएं को साफ करके बाहर निकालने वाली प्रणाली अपनायें 

अब हाइब्रिड वाहनों का जमाना है, जो कम ईंधन खायें, काले-जहरीले धुएं के दर्शन न करायें और लाल बत्ती देखकर स्वतः बंद हो जायें। हमें अपने वाहनों को ऐसी प्रणालियों के साथ ही बाजार में आने की इजाजत देने की दिशा में काम करना होगा।

सार्वजनिक वाहन को आदर्श बनायें।