जानिए लाल किले के बारे में 15 रोचक बातें।

- July 20, 2019

दिल्ली का लालकिला हमारे इतिहास की एक निशानी है. इससे जुड़ा इतिहास भी बहुत रोचक है. लालकिले के निर्माण से लेकर अब तक इसमें कई बदलाव हुए. तो जानिए लालकिले के बारे में रोचक बातें…


1. लाल किला दुनिया के सर्वाधिक प्रभावशाली भव्‍य किलों में से एक है. लाल क़िला का यह नाम इसलिए पड़ा क्‍योंकि यह लाल पत्‍थरों से बना हुआ है.

2. भारत का इतिहास भी इस क़िले के साथ काफ़ी नज़दीकी से जुड़ा हुआ है. यहीं से ब्रिटिश व्‍यापारियों ने अंतिम मुग़ल शासक, बहादुरशाह ज़फर को पद से हटाया था और तीन शताब्दियों से चले आ रहे मुग़ल शासन का अंत हुआ था.

3. भारत के सम्मान का प्रतीक और जंग-ए-आज़ादी का गवाह रहा दिल्ली का लाल क़िला सत्रहवीं शताब्दी में मुग़ल शासक शाहजहाँ ने बनवाया था.

4. मुग़ल शासक, शाहजहां ने 11 वर्ष तक आगरा पर शासन करने के बाद यह निर्णय लिया कि देश की राजधानी को दिल्‍ली लाया जाए और 1618 में लाल क़िले की नींव रखी गई. वर्ष 1647 में इसके उद्घाटन के बाद महल के मुख्‍य कक्षों को भारी पर्दों से सजाया गया. चीन से रेशम और टर्की से मखमल लाकर इसकी सजावट की गई.

5. लालकिले की योजना, व्यवस्था एवं सौन्दर्य मुग़ल सृजनात्मकता का अनुपम उदाहरण है, जो शाहजहाँ के समय में अपने चरम उत्कर्ष पर था. कहा जाता है कि इस क़िले के निर्माण के बाद कई विकास कार्य स्वयं शाहजहाँ द्वारा जोडे़ गए थे.

6. सम्पूर्ण विन्यास में कई बदलाव ब्रिटिश काल में 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद किये गये थे. ब्रिटिश काल में यह क़िला मुख्यतः छावनी रूप में प्रयोग किया गया था. स्वतंत्रता के बाद भी इसके कई महत्त्वपूर्ण भाग सेना के नियंत्रण में 2003 तक रहे.

7. यह किला भी ताजमहल की भांति ही यमुना नदी के किनारे पर स्थित है. यमुना नदी का जल इस किले को घेरने वाली खाई को भरती थी.

8. 11 मार्च 1783 को, सिखों ने लाल क़िले में प्रवेश कर ‘दीवान-ए-आम’ पर क़ब्ज़ा कर लिया था. नगर को मुग़ल वज़ीरों ने अपने सिख साथियों को समर्पित कर दिया. यह कार्य सरदार बघेल सिंह धालीवाल की कमान में हुआ.

9. लाल क़िले के निर्माण में प्रयोग में लाए गए लाल बालू पत्थरों के कारण ही इसका नाम लाल क़िला पड़ा. इसकी दीवारें ढाई किलोमीटर लंबी और 60 फुट ऊँची हैं. यमुना नदी की ओर इसकी दीवारों की कुल लंबाई 18 मीटर और शहर की ओर 33 मीटर है.

10. लाल किला सलीमगढ़ के पूर्वी छोर पर स्थित है. इसको अपना नाम लाल बलुआ पत्थर की प्राचीर एवं दीवार के कारण मिला है. यही इसकी चारदीवारी बनाती है. नापने पर ज्ञात हुआ है, कि इसकी योजना एक 82 मी. की वर्गाकार ग्रिड (चौखाने) का प्रयोग कर बनाई गई है.

11. लाहौर गेट से चट्टा चौक तक जाने वाली सड़क से लगे खुले मैदान के पूर्वी ओर नक़्क़ारख़ाना बना है. यह संगीतज्ञों के लिए बने महल का मुख्य द्वार है. छत्ता चौक के पास ही नक़्क़ारख़ाना है जहाँ संगीतकारों की महफिल सज़ा करती थी. इसके अन्य आकर्षणों में दीवान-ए-आम, दीवान-ए-ख़ास, हमाम, शाही बुर्ज, मोती मस्जिद, रंगमहल आदि शामिल हैं.

12. इस दरवाज़े को पार करने पर एक ओर खुला मैदान है, जो मूलतः दीवाने-ए-आम का प्रांगण था जिसे दीवान-ए-आम कहते थे. यह जनसाधारण के लिए बना वृहत प्रांगण था. सेंड स्‍टोन से निर्मित शेल प्‍लास्‍टर से ढका हुआ यह कक्ष हाथी दांत से बना हुआ लगता है, इसमें 80 X 40 फीट का हॉल स्‍तंभों द्वारा बांटा गया है. मुग़ल शासक यहाँ दरबार लगाते थे और विशिष्ट अतिथियों तथा विदेशी व्‍यक्तियों से मुलाकात करते थे.

13. राजगद्दी के पीछे की ओर शाही निजी कक्ष स्थापित हैं. इस क्षेत्र में, पूर्वी छोर पर ऊँचे चबूतरों पर बने गुम्बददार इमारतों की कतार है, जिनसे यमुना नदी का किनारा दिखाई पड़ता है. ये मण्डप एक छोटी नहर से जुडे़ हुए हैं, जिसे ‘नहर-ए-बहिश्त’ कहते हैं, जो सभी कक्षों के मध्य से होकर जाती है.

14. 1739 में फारसी शासक नादिरशाह ने लाल क़िले पर आक्रमण करके इसके बग़ीचे और दीवारों को क्षतिग्रस्त कर दिया था. 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों ने इसे भारी नुक़सान पहुँचाया था. इसके बाद से आज़ादी तक लाल क़िला अंग्रेजों के कब्ज़े में रहा. ब्रिटिश शासकों ने इसे ‘ब्रिटिश-इंडियन आर्मी’ का मुख्यालय बना लिया था. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटिश सेना ने लाल क़िले पर नियंत्रण कर लिया.

15. एक समय था, जब 3000 लोग इस इमारत समूह में रहा करते थे, परंतु 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद, क़िले पर ब्रिटिश सेना का क़ब्ज़ा हो गया, कई रिहायशी महल नष्ट कर दिये गये. इसे ब्रिटिश सेना का मुख्यालय भी बनाया गया. इसी संग्राम के एकदम बाद बहादुरशाह ज़फर पर यहीं मुकदमा भी चला था. यहीं पर नवंबर 1945 में ‘इण्डियन नेशनल आर्मी’ के तीन अफ़सरों का कोर्ट मार्शल किया गया था. यह स्वतंत्रता के बाद 1947 में हुआ था. इसके बाद भारतीय सशस्त्र सेना ने इस क़िले का नियंत्रण ले लिया था. बाद में दिसम्बर 2003 में, भारतीय सेना ने इसे भारतीय पर्यटन प्राधिकारियों को सौंप दिया.   
Advertisement

 

Start typing and press Enter to search